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यूपी में पंचायत चुनाव टलना लगभग तय, अब विधानसभा चुनाव के बाद ही होगा मतदान!

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उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तय समय पर होना मुश्किल दिख रहा है। आरक्षण, मतदाता सूची और कानूनी प्रक्रिया में देरी के कारण अब पंचायत चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव के बाद होने की संभावना तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश आलम की खबर:उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर तस्वीर अब लगभग साफ होती नजर आ रही है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह माना जा रहा है कि राज्य में पंचायत चुनाव तय समय पर कराना अब संभव नहीं रह गया है। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायतों का कार्यकाल अगले कुछ महीनों में समाप्त होने जा रहा है, लेकिन नई पंचायतों के गठन की प्रक्रिया अब तक उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी है, जहां समय पर चुनाव संपन्न कराया जा सके। ऐसे में अब यह संभावना बेहद मजबूत हो गई है कि पंचायत चुनाव अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जाएं।

सूत्रों के अनुसार, सरकार और राजनीतिक दलों की प्राथमिकता इस समय पंचायत चुनाव नहीं, बल्कि 2027 का विधानसभा चुनाव है। यही वजह है कि सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक, किसी की ओर से पंचायत चुनाव को लेकर कोई तेज राजनीतिक मांग सामने नहीं आ रही है। चुनावी समीकरणों को देखते हुए भी कोई दल अभी स्थानीय निकाय चुनावों में अपनी ताकत झोंकने के मूड में नहीं दिख रहा।

समय निकलता जा रहा, लेकिन प्रक्रिया अब भी अधूरी

प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई, क्षेत्र पंचायतों का 19 जुलाई और जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई को समाप्त हो रहा है। लेकिन इसके उलट चुनाव की बुनियादी तैयारी अभी अधूरी है। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए अंतिम मतदाता सूची 15 अप्रैल को प्रकाशित होनी है। इसके बाद आरक्षण की प्रक्रिया, आयोग की रिपोर्ट, प्रशासनिक तैयारी, अधिसूचना और मतदान जैसे कई अहम चरण बाकी रह जाएंगे। यही कारण है कि समय सीमा के भीतर चुनाव कराना अब लगभग असंभव माना जा रहा है।

यही वजह है कि शासन और प्रशासनिक गलियारों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। अगर ऐसा करना कानूनी रूप से संभव नहीं हुआ, तो फिर प्रशासक नियुक्त करने का विकल्प अपनाया जा सकता है। यह स्थिति पहले भी कई बार देखने को मिली है, जब पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई व्यवस्था लागू होने तक प्रशासनिक नियंत्रण में कामकाज चलाया गया।

राजनीतिक दलों की चुप्पी बहुत कुछ कह रही

यूपी की राजनीति में पंचायत चुनावों को हमेशा बड़े राजनीतिक संकेतक के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन इस बार स्थिति अलग नजर आ रही है। भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा—चारों प्रमुख दल इस मुद्दे पर लगभग शांत हैं। सामान्य तौर पर अगर पंचायत चुनाव समय पर न हों तो विपक्ष सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ता, लेकिन इस बार ऐसा माहौल नहीं दिख रहा। इससे साफ संकेत मिल रहा है कि सभी दल फिलहाल अपना फोकस 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिकाए हुए हैं।

पंचायतीराज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने भी संकेतों में यही बात कही है कि फिलहाल सभी की नजर न्यायालय और प्रशासनिक प्रक्रिया पर टिकी हुई है। उन्होंने माना कि अभी सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की ओर से पंचायत चुनाव को लेकर कोई विशेष दबाव नहीं दिख रहा। इससे यह साफ हो गया है कि राजनीतिक रूप से भी पंचायत चुनाव को फिलहाल टालना कई दलों के लिए सुविधाजनक माना जा रहा है।

पंचायत चुनाव टलने की आशंका अब सिर्फ राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मामला न्यायपालिका तक भी पहुंच चुका है। इस संबंध में हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है, जिसमें चुनाव प्रक्रिया की धीमी रफ्तार और संभावित देरी को मुद्दा बनाया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर मतदाता सूची ही अप्रैल के मध्य तक अंतिम रूप में आएगी, तो उसके बाद आरक्षण प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचेगा।

याचिका में यह भी आशंका जताई गई है कि यदि समय पर चुनाव नहीं हो पाए, तो राज्य को फिर से प्रशासकों के भरोसे पंचायत व्यवस्था चलानी पड़ सकती है। अदालत ने इस पूरे मामले में राज्य निर्वाचन आयोग से शपथपत्र भी मांगा था। सूत्रों के मुताबिक आयोग ने अपना पक्ष अदालत के सामने रख दिया है और अपनी तैयारियों की स्थिति स्पष्ट कर दी है। अब सबकी निगाह अदालत की अगली सुनवाई और संभावित टिप्पणी पर टिकी हुई है।

आरक्षण की गुत्थी सबसे बड़ी बाधा

पंचायत चुनाव में सबसे बड़ी अड़चन इस बार आरक्षण प्रक्रिया को माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट जरूरी होती है। लेकिन अभी तक इस आयोग का गठन ही नहीं हो सका है। यही देरी अब चुनाव कार्यक्रम पर भारी पड़ती दिख रही है।

दरअसल, आयोग को जिलों में जाकर ओबीसी आबादी का आंकड़ा जुटाना होता है और उसी आधार पर ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के पदों पर आरक्षण तय किया जाता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ तकनीकी है, बल्कि कानूनी रूप से भी बेहद संवेदनशील मानी जाती है। यदि इसमें किसी स्तर पर गड़बड़ी होती है, तो पूरा चुनाव न्यायिक विवाद में फंस सकता है।

नियमों के मुताबिक, किसी ब्लॉक में ओबीसी आबादी 27 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद ग्राम प्रधान के पद 27 प्रतिशत से अधिक आरक्षित नहीं किए जा सकते। वहीं अगर आबादी 27 प्रतिशत से कम है, तो उसी अनुपात में आरक्षण तय किया जाता है। हालांकि, पूरे प्रदेश स्तर पर पंचायत चुनावों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण बनाए रखना अनिवार्य है। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट के बिना आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ाना संभव नहीं है।

प्रशासक या कार्यकाल विस्तार, क्या होगा अगला कदम?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं होते, तो सरकार अगला कदम क्या उठाएगी? मौजूदा संकेतों के अनुसार, सरकार के पास दो विकल्प हैं। पहला—मौजूदा पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल कुछ समय के लिए बढ़ा दिया जाए। दूसरा—अगर इसमें कोई कानूनी बाधा आती है, तो संबंधित इकाइयों में प्रशासक बैठा दिए जाएं।

राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से दोनों विकल्प बेहद अहम हैं। कार्यकाल बढ़ाने का फैसला जहां मौजूदा जनप्रतिनिधियों को राहत देगा, वहीं प्रशासक नियुक्त होने की स्थिति में स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व खत्म हो जाएगा और प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ जाएगा। इससे गांवों में विकास कार्यों और योजनाओं के संचालन पर भी असर पड़ सकता है।

गांव की सरकार पर अनिश्चितता का साया

पंचायतें ग्रामीण भारत की लोकतांत्रिक रीढ़ मानी जाती हैं। गांव की सड़क, नाली, पानी, आवास, मनरेगा, शौचालय, राशन और स्थानीय विकास की कई योजनाएं इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से जमीन पर उतरती हैं। ऐसे में अगर पंचायतों का नया गठन समय पर नहीं होता, तो इसका सीधा असर ग्रामीण प्रशासन और विकास योजनाओं पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि पंचायत चुनाव सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं, बल्कि गांव की सरकार की निरंतरता का सवाल भी है। लेकिन फिलहाल जो हालात बन रहे हैं, उससे यही लगता है कि उत्तर प्रदेश में गांव की सत्ता को लेकर कुछ समय तक असमंजस की स्थिति बनी रह सकती है।

अब सबकी नजर सरकार और कोर्ट पर

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अब तस्वीर लगभग साफ है, लेकिन अंतिम फैसला अभी भी औपचारिक रूप से सामने आना बाकी है। प्रशासनिक देरी, आरक्षण प्रक्रिया, आयोग गठन और कानूनी पेच ने मिलकर इस चुनाव को मुश्किल मोड़ पर ला खड़ा किया है। राजनीतिक दलों की चुप्पी भी इस ओर इशारा कर रही है कि पंचायत चुनाव को फिलहाल टाल देना ही सबके लिए आसान रास्ता माना जा रहा है।

अब देखना यह होगा कि सरकार मौजूदा पंचायतों का कार्यकाल बढ़ाती है, प्रशासक नियुक्त करती है या फिर न्यायालय इस पूरे मामले में कोई सख्त निर्देश देता है। लेकिन इतना तय है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का रास्ता अब पहले जैसा सीधा नहीं रह गया है।

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